Raat ke 12 baje
रात के ठीक १२ बजे कब्रिस्तान का मंज़र एक अलग ही रूप ले लेता है। यह वो पल होता है जब रात अपनी सबसे गहरी स्याही घोल चुकी होती है और वक़्त पल भर के लिए ठहर सा जाता है। घड़ी की सुइयों का एक साथ १२ पर आकर मिलना, मानों दो दुनियाओं के बीच का पर्दा ज़रा सा खिसका देता है।
चाँद आसमान के ठीक बीच में आ खड़ा होता है और उसकी ठंडी, मद्धम रोशनी कब्रों के पत्थरों (क़तबों) पर एक अजीब सी रूपहली चमक बिखेर देती है। पुरानी कब्रों की लंबी-तिर्छी परछाइयाँ ज़मीन पर फैल जाती हैं, जैसे कोई खामोश आकृतियाँ नीचे लेटी हों।
उस वक़्त का माहौल कहानी के लिहाज़ से कुछ यूँ ठहरता है:
- सन्नाटे का भारीपन: यह साधारण सन्नाटा नहीं होता; यह एक भारी, जमा देने वाली ख़ामोशी होती है। हवा अचानक चलना बंद हो जाती है, और माहौल में एक ऐसी स्थिरता आ जाती है जहाँ इंसान को अपनी ही धड़कनें साफ़ सुनाई देने लगती हैं।
- अचानक बदलती आवाज़ें: इसी ख़ामोशी को चीरती हुई कोई अनजानी आवाज़ उभरती है—किसी दूर पेड़ से उल्लू की तीखी कूक, सूखी झाड़ियों में किसी चीज़ के रेंगने की 'सर-सर', या हवा का एक अचानक आया ठंडा झोंका जो पुरानी कब्रों पर टंगे सूखे फूलों को हिला जाता है।
- ठंडक और ओस की महक: रात के इस पहर मिट्टी से एक अलग ही सीलन और ओस की ठंडक उठती है। कब्रों के आसपास फैली नीम या बरगद के पेड़ों की छाँव उस अंधेरे को और घना बना देती है।